दो हफ्ते बाद पहली बार सार्वजनिक बयान
केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के ठीक दो हफ्ते बाद पूर्व मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को अपनी चुप्पी तोड़ी। भुवनेश्वर की जीएम यूनिवर्सिटी में छात्रों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से बताया कि आखिर उन्होंने शिक्षा मंत्री का पद क्यों छोड़ा। नीट पेपर लीक विवाद और उसके बाद देशभर में फैले छात्र आंदोलन के बीच 25 जुलाई 2026 को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना त्यागपत्र सौंपा था। अब उन्होंने साफ कहा कि जेन-जी को गुमराह करने की कोशिशें की गईं, जिसके कारण उन्हें यह फैसला लेना पड़ा।
जेन-जी को गुमराह करने की कोशिश
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, “जेन-जी हमारे बच्चे हैं। कुछ लोगों ने उन्हें गुमराह करने की कोशिश की। तब मेरा कोई निजी मसला नहीं था। भारत में हर साल कम से कम दो करोड़ बच्चे पैदा होते हैं। पिछले 10 सालों में 20 करोड़ बच्चे पैदा हुए। उनकी अपनी उम्मीदें हैं और वे भारत को विश्व गुरु बनाएंगे। मेरे लिए पद महत्वपूर्ण नहीं था।” उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री से संपर्क किया था और मंत्रिपरिषद से इस्तीफा देने की पेशकश की थी। यह फैसला गहन चर्चा के बाद लिया गया था।
इस्तीफे के समय का पत्र और मंशा
इस्तीफे के समय अपने पत्र में प्रधान ने लिखा था कि पिछले 10 दिनों के घटनाक्रम से उनका मन दुखी है। यह व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय नहीं है। भारत की युवा शक्ति देश की असली ताकत है। जंतर-मंतर और देश में जो स्थिति बनी है, उसका राष्ट्र-विरोधी ताकतें फायदा न उठाएं, देश की एकता बनी रहे, किसी भी विद्यार्थी का भविष्य कानूनी पेचीदगियों में न उलझे और बच्चे पढ़ाई पर ध्यान दें—इसीलिए उन्होंने इस्तीफा दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि 3 मई 2026 को हुई नीट-यूजी परीक्षा में अनियमितता सामने आने के बाद सरकार ने तुरंत सीबीआई जांच सौंपी, परीक्षा रद्द की और दोबारा परीक्षा कराई। पहले दिन से उन्होंने जिम्मेदारी ली और कभी मुंह नहीं मोड़ा।
युवाओं और देशहित को प्राथमिकता
अब चुप्पी तोड़ते हुए प्रधान ने युवाओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग जेन-जी को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे थे। पद उनके लिए कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा। ओडिशा में उन्होंने नवीन पटनायक पर भी आरोप लगाया कि उन्होंने युवाओं को उनके खिलाफ प्रदर्शन के लिए उकसाया। प्रधान का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस्तीफे के बाद वे लंबे समय तक चुप रहे थे। छात्र आंदोलन के दौरान उनकी बर्खास्तगी की मांग जोर-शोर से उठ रही थी और कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन चल रहा था।
राजनीतिक और सामाजिक असर
धर्मेंद्र प्रधान के इस बयान से साफ होता है कि उन्होंने युवाओं के भविष्य और देश की एकता को प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि जेन-जी ऐसी ताकत है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, पद छोड़ने का फैसला युवाओं को भ्रम के जाल से बचाने और राष्ट्र-विरोधी ताकतों को मौका न देने के लिए लिया गया। यह बयान उन आलोचनाओं का जवाब भी है जिनमें उन्हें अड़ियल रवैया अपनाने और डैमेज कंट्रोल में नाकाम रहने का आरोप लगाया जा रहा था।
कुल मिलाकर, धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने साफ किया कि इस्तीफा व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा या दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि युवाओं और देशहित में लिया गया फैसला था। अब देखना होगा कि यह बयान राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं में कितना असर छोड़ता है। युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं को लेकर उनका यह रुख आने वाले दिनों में और चर्चा का विषय बनेगा।
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